भारत में विमुद्रीकरण

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विमुद्रीकरण का अर्थ है संचलन से किसी विशेष मुद्रा की वापसी और असंतुलन और इसे एक नई मुद्रा के साथ स्थानांतरित करना। हाल ही में, भारत सरकार द्वारा सबसे बडा विमुद्रीकरण का निर्धारण करने का निर्णय लिया गया तथा कानूनी निविदा के रूप में 500 और 1000 मूल्यवर्ग के नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

केंद्र सरकार से यह कदम विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मास्टर स्ट्रोक घोषित किया गया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार को रोकने और नकदी रहित लेनदेन को बढ़ावा देना है। भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में काले धन के खिलाफ यह सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान माना जाता है। भारत में आरबीआई के रिकॉर्ड के अनुसार, 87% लेनदेन नकद लेनदेन हैं। वर्तमान में उच्च मूल्यों का भारत में संचलन में नोटों के 86% के कुल मूल्य के लिए नोट है जो कि भारत की राजकोषीय घाटे को कम करने और कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करेगा। इससे पहले भारत ने सन 1946 में मुद्रा का विमुद्रीकरण किया था और बेहिसाही धन व काला धन को रोकने के लिए 1000 और 10000 के नोटो पर प्रतिबन्ध लगा दिया । दूसरी बार यह 1 9 78 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता वाली सरकार द्वारा किया गया था, जब 1000 रुपये, 5000 और 10000 नोट्स का प्रारूपण किया गया था।

विमुद्रीकरण निश्चित दौर पर भारत के लिए अच्छा होगा और काले धन पर अंकुश लगाने में मदद करेगा। यह देश के भीतर हर लेनदेन में स्पष्ट दृष्टिकोण लाता है और कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देता है। विमुद्रीकरण से व्यापारी, किसान, व छोटे तबके के लोग थोडा परेशान होते हैं परन्तु उनके उत्तम भविष्य एवं देश के हित के लिए बहुत जरूरी है। विमुद्रीकरण का उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था को निश्चित रूप से मजबूत करना है।